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Sunday, February 6, 2011

स्वामी विवेकानन्द (शष्टम दृश्य)

// शष्टम दृश्य //
    भरसक प्रयत्न करने पर भी जब कोई रास्ता न मिला तो रामकृष्ण की याद आई और नरेन्द्र एक दिन दक्षिणेश्वर पहुँच गये।
    इस विचार से नरेन्द्र एक दिन दक्षिणेश्वर आये और श्रीरामकृष्ण से आग्रह करने लगे- “आपको इसकी कोई न कोई व्यवस्था कर ही देनी होगी। अपनी माता से एक बार कहें, इससे हमारे सब कष्टों का अन्त हो जाएगा। श्री रामकृष्ण ने नरेन्द्र से मन्दिर में जाकर माता के निकट प्रार्थना करने के लिए कहा। लगातार तीन बार माता के समीप जाकर भी सांसारिक अभाव की बात वे नहीं कह सके- उन्होंने माँगा केवल विवेक-वैराग्य ही। तब श्री रामकृष्ण बोले- “अच्छा जा । माँ से कहूँगा कि तुम्हें सादे अन्न वस्त्र का कभी अभाव न हो।
            श्री रामकृष्ण से यह आशीर्वाद प्राप्त होने के बाद नरेंद्र नाथ का सांसारिक अभाव कुछ अंश में दूर हुआ। उन्हें कुछ-कुछ काम मिलने लगा। इधर श्री रामकृष्ण देव ने उन्हें विभिन्न उपायों के माध्यम से धीरे-धीरे साधना के अधिकाधिक उच्च स्तरों की ओर अग्रसर कराने लगे। विविध अतीन्द्रिय दिव्यानुभूतियों से गुजरते हुए नरेंद्र नाथ का जीवन क्रमश: परम सत्य में प्रतिष्ठित हो गया।  श्री रामकृष्ण के जीवन में दिखाई देने वाले विभिन्न आचरणों की ओर अब वे एक नवीन दृष्टि से देखने लगे।





Saturday, February 5, 2011

स्वामी विवेकानन्द पञ्चम दृश्य

// पञ्चम दृश्य //
  1. नरेन्द्र (विवेकानन्द) के पिता का देहान्त -1884 ।
  2. परिवार में अर्थव्यवस्था का बिगड़ना।
  3. स्नातक तक की पढ़ाई के बाद भी 30/- रुपये तक की नौकरी का न मिलना।
  4. अन्त में माता, भाई-बहनों को लेकर नानी के घर में आश्रय लेना।
  5. नरेन्द्र जैसे दृढ़ निश्चयी, परिश्रमी को 30/- रुपये तक की नौकरी भी न मिलना, किसी दैवी इच्छा का ही फल था, क्योंकि उन्हें तो सन्यासी ही बनना था।

Friday, February 4, 2011

स्वामी विवेकानन्द चतुर्थ दृश्य


// चतुर्थ दृश्य //
                     एक दिन दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण के कक्ष में केशवचन्द्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी आदि लब्धप्रतिष्ठ ब्राह्म नेतागण उपस्थित थे। कई भक्तगण भी उपस्थित थे। काफी देर भगवत् प्रसंग हुआ। केशवचन्द्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी आदि के विदा ले कर चले जाने पर श्रीरामकृष्ण ने स्नेहपूर्वक नरेन्द्र की ओर ताकते हुए कहा- “देखा, जिस शिक्तिविशेष के उत्कर्ष से केशव जगद्विख्यात बना है, वैसी अठारह शक्तियाँ नरेन्द्र के भीतर पूर्ण मात्रा में विद्यमान हैं।
            स्वामी जी ने स्वयं कहा था- “यदि और एक विवेकानन्द होता तो वह समझ सकता कि यह विवेकानन्द क्या कर गया।“ उन्होंने और भी कहा था-“.....मैं जो दे गया, वह डेढ़ हजार वर्ष की खुराक है।
                    

// टिप्पणी  //
    “विश्व्वासियों के विचार-जगत् के लिए वे डेढ़ हजार वर्ष की खुराक दे गए। संसार के
कल्याण के लिए,विश्वशान्ति के लिए स्वामीजी जो साम्य, मैत्री, स्वाधीनता, विश्वबन्धुत्व, विश्वमानवता आदि का भाव दे गए एवं सर्वतोपरि जो अपूर्व आध्यात्मिक भाव राशि प्रदान कर गये। वह सब अब धीरे धीरे भिन्न भिन्न माध्यमों के द्वारा कार्यान्वित हो रहा है। स्वामी जी की अमोघ भाव धारा आज समस्त संसार के विचारशील व्यक्तियों को प्रेरणा-उद्दीपना दे रही है। वे भावरुप में जाग्रत रहकर शतशत प्राणों में अनुप्रेरणा जगा दे रहे हैं।
             

Thursday, February 3, 2011

स्वामी विवेकानन्द तृतीय दृश्य

// तृतीय दृश्य //
     नरेन्द्र घर लौट गया। परन्तु सब समय अब राम कृष्ण का विचार उन्हें चैन नहीं लेने देता था। अन्त में नरेन्द्र अकेले ही दक्षिणेश्वर की ओर चल पड़े। इधर मानो राम कृष्ण नरेन्द्र की प्रतिक्षा ही कर रहे थे।
          नरेन्द्र के आ पहूँचते ही वे अधीर हो उठे और `तू आया ? कहकर उन्हें तख्त पर अपने पास बैठा लिया। फिर वे बड़े स्नेह से उनकी ओर देखने लगे। देखते ही देखते श्री रामकृष्ण में अद्भुत भावान्तर उपस्थित हुआ। वे भावाविष्ट से हो अस्पष्ट स्वर में अपने आप से ही कुछ बोलते हुए धीरे धीरे नरेन्द्र के बिलकुल निकट आ गए। इसके बाद जो हुआ उनका वर्णन नरेन्द्र नाथ ने इस प्रकार किया है। “...अकस्मात मेरे निकट आकर उन्होंने अपने दाहिने पाँव से मुझे छू दिया। उस स्पर्श से क्षण्भर में मुझमें एक अपूर्व अनुभूति आ उपस्थित हुई। आँखे खुली ही थी---देखा, दिवार समेत कमरे की सारी चीजें बड़े वेग से घुमती हुई न जाने कहाँ विलीन होती जा रहीं हैं और समग्र विश्व के साथ मेरा मैं-पन बी मानो एक सर्वग्रासी महाशून्य में विलीन हो जाने के लिए वेग से बढ़ता चला जा रहा है।मैं अत्यन्त भय से विह्वल हो गया।मन में आया-मैंपन का नाश ही तो मृत्यु है! वही मृत्यु सामने, अति निकट आ पहुँची है! अपने को सम्हाल न सकने के कारण मैं चिल्ला उठा-‘अजी, आपने मेरा क्या कर डाला? मेरे माता-पिता जो हैं!”
            “वह अदभुत ‘पागल’ मेरी यह बात सुन ठहाका मारकर हँस उठा। फिर अपने हाथ से मेरी छाती का स्पर्श कर वे कहने लगे, ‘तो अब रहने दे। एक ही बार में आवयश्क नहीं, समय पर होगा।‘और आश्चर्य की बात यह कि, उनसे इस प्रकार स्पर्श कर वह बात कहते ही मेरी वह अपूर्व अनुभूति एकदम चली गयी। मैं होश में आया और कमरे के भीतर-बहर की सभी वस्तुएँ मुझे फिर पहले ही जैसी स्थित दिखाई देने लगी।“

Wednesday, February 2, 2011

स्वामी विवेकानन्द द्वितीय दृश्य


// द्वितीय दृश्य //
कुछ मित्रों को साथ लेकर सुरेन्द्र नाथ के साथ नरेन्द्र का दक्षिणेश्वर पहुचंना । राम कृष्ण ने नरेन्द्र को बड़े भाव से बैठ्ने को कहा और गाने को भी कहा ।

                नरेन्द्र ने बड़े भाव और भक्ति से गाया:-
1.      `मन चलो निज निकेतने।
   संसार-विदेशै, विदेशीर वेशे, भ्रमो केनो अकारणे॥
2.      जाबे कि हे दिन आमार विफले चलिये।
आछि नाथ दिवानिशि आशापथ निरखिये॥
नरेन्द्र के भाव पूर्ण मधुर स्वर की गुंजार से राम कृष्ण अपने आपको सम्भाल न सके। भाव मुग्ध हो फिर समाधि में चले गये।
समाधि से स्वस्थ होने पर:-
भगवान को कभी देखा जा सकता है या नहीं- इस प्रसंग में राम कृष्ण ने
आशा भरे  शब्दों में कहा, ”हाँ जी, उन्हें देखा जा सकता है। मैं जैसे तुम्हें देख रहा हूँ,
तुमसे बातचीत कर रहा हूँ , थीक वैसे ही- बल्कि उससे भी तीव्रता से ईश्वर को देखा जा सकता है, उनसे वार्तालाप किया जा सकता है।किन्तु भला यह करना कौन चाह्ता है ? लोग स्त्री-पुत्रों के लिए शोक से लोटा-    लोटा भर आँसू बहाते हैं, विषय-सम्पत्ति, धनदौलत के
लिए कितना रोते हैं, पर भला बताओ तो, भगवान्-लाभ नहीं हुआ इसलिए कौन रोत है? उनका लाभ नहीं हुआ इस दु:ख से यदि कोइ रो-रोकर उन्हें पुकारे, तो उसे वे निश्चित ही दर्शन देते हैं।“

Tuesday, February 1, 2011

स्वामी विवेकानन्द प्रथम दृश्य

                           प्रथम दृश्य 
                       
कलकत्ता          :सुरेन्द्र नाथ के घर का पर एक आयोजन।
उपस्थित सज्जन   (1) स्वामी राम कृष्ण
                (2) नरेन्द्र नाथ के मित्र
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5.    नरेन्द्र नाथ (उनका का गान)
नरेन्द्र नाथ का गान सुनकर राम कृष्ण का भाव समाधि में चले जाना।
ठीक (स्वस्थ) होने पर स्वामी राम कृष्ण ने नरेन्द्र को दक्षिणेश्वर आने को कहा।
           नरेन्द्र नाथ ने आने का वचन दे दिया।